जिस स्त्री का पुरुष साथी कमजोर होता है, वो स्त्री भी कमजोर हों जाती है.
स्त्री और पुरुष हजार वर्षों से साथ रहते हुए आए हैं।
पति-पत्नी के तौर पर, पिता पुत्री के तौर पर, भाई बहन और कार्यस्थल पर साथियों के तौर पर।
पति-पत्नी का रिश्ता इस संसार के सबसे अनूठे रिश्तो में से एक है,
दो लोग एक सामाजिक स्वीकृति के तहत, जीवन भर साथ रहते हैं।
मेरा अनुभव रहा है कि संसार में कई स्त्रियां अपने परिवार में पुरुषों से आगे निकल जाती है, आगे निकलना कोई बुरी बात नहीं है. लेकिन कोई अकेला ही निकल जाए आगे तो यह बड़ी समस्या की बात है.
ऐसी स्थिति में पुरुष कमजोर पड़ने लगता है, उसकी आर्थिक स्थिति सामाजिक स्थिति पर इस बात का गहरा प्रभाव पड़ता है.
इस अवस्था के इधर हम दूसरी अवस्था को भी देख ले जरा.
जिस स्त्री का पुरुष कमजोर पड़ने लगे, और स्त्री कहीं आगे नहीं बढ़ पाए, ऐसी स्त्री में सबसे ज्यादा भरोसा स्त्री का अपने जीवन के प्रति ही टूटा है.
समाज में शराबी है, जुआ खेलने वाले लोग हैं, गरीब किसान है, या दैनिक दिहाड़ी करने वाले गरीब लोग हैं। आप सोच कर देखिए उनकी स्त्रियों की क्या हालत है, उन्हें अपने ही परिवार और अपने ही सामाजिक परिवेश में गहरे स्तर की चुनौतियां मिलती है। ऐसी स्त्रियों का जीवन दैनिक लड़ाइयों से भरपूर होता है। अस्तित्व का संकट इसे ही कहा जाएगा।
यह दुनिया एक बहुत विचित्र संतुलन के अंतर्गत आगे बढ़ रही है।
असंतुलित अवस्थाएं यहां पर सामने वाले पार्टनर को मार डालती है, स्त्री कमजोर है तो पुरुष फिर भी ज्यादा मेहनत करके परिवार को आगे बढ़ा लेता है।
लेकिन अगर पुरुष कमजोर है, या उसे स्त्री ही कमजोर कर रही है. तो ऐसे मे अंतोगत्वा स्त्री को बुरे संकट से गुजरना पड़ता है।
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