दिल्ली यात्रा
27 अक्टूबर को दिल्ली जाना हुआ।
दीपावली की छुट्टियां चल रही है, मै लगभग फ्री ही था।
दीदी सुनीता बैंसला जी से बात हुई तब उन्होंने दिल्ली आने के लिए कहा था, कर्नल साहब की किताब का काम अधूरा है तो दिल्ली आकर उसे पूरा कर लो।
27 तारीख की सुबह 6:15 की ट्रेन थी कोटा से। सुबह जल्दी उठकर हिंडोली गया बाइक पर, वहाँ से राजू जी को लेकर कोटा निकल गया। राजू जी के घर चाय पीने मे आधा घंटा खर्च हों गया। बहुत कोशिश की, लेकिन ट्रेन छूट गयी। एक मिनट का फासला रह गया था। टाइम की कीमत पता चली, जब पांच घंटे का रास्ता अब बस मे चौदह घंटे मे पूरा किया और पैसा भी चार-छ गुना लगा। कोटा से दिल्ली 250 रुपये का टिकट था ट्रेन मे। बस मे कुल 1400 रुपये खर्च हुए।
खैर दिल्ली पहुँचा, दीदी और अजय जीजाजी के साथ इंदर भाई इतज़ार कर रहे थे।
दीदी का घर C1/16 बापा नगर मे है। सरकारी आवास है। दीदी ने बहुत खूबसूरती से मेंटेन कर रखा है घर को। कम से कम सामान दिखाई देता है। परिवार की तस्वीरें सजा रखी है, सोफे, डायनिंग टेबल साधारण मजबूत और साफ सुथरे।
दीदी को आधी चिंता तो उनके घर के पौधों और यहाँ रह रही बिल्लीयो की ही रहती है। उनका खाना पानी दीदी की प्राथमिकताओं मे है।
जीजाजी अनुशासित व्यक्ति है, ऑब्जेक्टिव बात करते है, और हमारे खाना पानी का खास ख्याल रखते है। सतर्क दिमाग है उनका, और दिल ओल्ड लॉफी है। पुराने गाने मध्यम आवाज मे सुनने का शौक है उन्हें।
जीजाजी के बाल बड़े सिल्की और अच्छे से कट रहते है। गाहे बगाहे जुल्फों मे हाथ फिराते रहते है।
इंदर भाई और मै प्रभात प्रकाशन गए दो दिन। काम किया, कर्नल साहब की कोटेशन वाली किताब लगभग तैयार है। दो और किताबें आनी है, उन्हें भी थोड़ा बहुत देखा।
30 अक्टूबर को सुबह 7:10 की ट्रेन से कोटा निकल गए हम दोनों।
दीदी की जीवन शैली और इस शहर की तासीर से बहुत सीखने को मिला।
सार्वजनिक जीवन और नौकरी मे ईमानदारी को लेकर दीदी से चर्चा हुई। संतोष परम् सुखम की भावना समझ मे आई, बाकी भूख की कोई सीमा नही है।
अभी इतना ही। मथुरा स्टेशन आ गया।
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